बिंदियां चिपकीं हैं फ्रिज पर इन्हें रहने दो,
इनसे कुछ ख्याल जुड़े है इन्हें रहने दो,
ये टूटी खिड़कियां खटकतीं हैं तुम्हें,
यहां से पुरानी हवा बहती है इन्हें रहने दो,
उसने जैसे मेरे खातिर ही लगाए थे ये अमोले,
अब ये दरख़्त मुझसे बात करतें हैं इन्हें रहने दो,
कभी मिर्च के पकौड़े बना कर खाया करो जो,
तीखी सी महक रह जाए रसोई में, उन्हें रहने दो |
वो ये बात हर द़फे तो नहीं करता,
आजिज़ हो जाता है इन्सान, वरना ये नहीं करता,
तेरे बस्ते में तो पड़े हैं नुस्खे बड़े,
नब्ज़ तो टटोल लेता है मगर, इलाज़ नहीं करता,
है तुझिको शायद या मुझको भी यकीं,
खुदको फुसला लेता हूं मगर, तुझे इनकार नहीं करता,
कसक ऐसी बैठी है उनके हवाले से,
लग जाए ना आह कोई, मैं उन्हें याद नहीं करता,
ये क्या लगी, तुझसे दिल की लगी ,
तू ख्याल भी नहीं करता, तू इनकार भी नहीं करता,
तेरे असोरे में लगाए हैं जमघट बड़े,
वो तुझे तूं करें, तू सवाल भी नहीं करता।
